Facetious Resonance

All my lips remember, is your only taste.
My neck can feel, your thunder breathe.
My eyes keep searching a similar face.
And my ears, your facetious resonance.

My silence, replays the memories,
That we formed & lived together.
And tells you those untold stories,
That I kept buried inside my heart.

Though I’m alone & untouched,
Since the time you disappear.
But the sensation of holding you,
Within my arms, is still effectual.

Hope, I could have been given,
Another moment that night, to utter.
No matter how long I live & suffer,
Your love will remain unfaded forever.

18.01.2017

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The Wait…

Under a million stars & MOON LIGHT,
I miss random people late NIGHT.
Waiting for countless hours on Bus Stop,
Just to confine that magnificent SMILE.

Scanning every window for a single glimpse,
Even knowing that she’s might not INSIDE.
Traveling on the same bus but far apart,
And hiding from her turning face, with FRIGHT.

Slowly – Slowly this secret fellowship becomes random,
And I realized that I haven’t seen her since FORTNIGHT.
But how can I forget those moments of TREASURE.
Only because of her my life’s been a PLEASURE,
Those times of happiness how can anyone MEASURE..??

15-04-2016

तेरे शहर का मौसम,

लो… तेरे शहर का मौसम,
आज फिर नाराज़ है मुझसे।
ये अभी धमकी भरी ग़रज़,
शायद मुझे भगाने के लिए थी…

शायद, ये आज फिर डर सा गया है,
बरसो बाद मेरे यू वापस आ जाने से.
की कहीं फिर से ना खो बैठे ये,
एक और ग़ुलाब कोई तुम जैसा…

जिन बूंदों में बेहिसाब सी,
मस्ती हुआ करती थी…
आज रोते हुए से लगते हैं.
जैसे किसी अपने की याद दिल दी हो मैंने.

ये पत्ते – ये टहनियाँ जो कभी,
उन बेबाक अल्हड़ हवाओं के संग.
रह रह कर तुम्हे उस खिड़की के पीछे,
मेरी नज़रों से छुपाया करती थीं,
आज चुपचाप सिर झुकाये खड़ी हैं…

ये वही गली है जहाँ से आखिरकार,
तुम, मुझे बिना एक नज़र किये,
मुझे तन्हा छोड़ कर चले गए थे…
उस दिन को मैंने कभी हक़ीक़त नही माना।
वो आज भी मेरे लिए एक डरावने ख्वाब सा है,
जो आँखो से उतरना भूल गया…

मेरे लिए तो तुम आज भी वही हो,
खिड़की के उस परदे के पीछे
अब तो पर्दा हटाओ – या की नीचे आओ.
की आज ये तुम्हारा राज, काले कोट में,
साहब बन के लौटा है…
कम से कम उसकी नज़र ही उतार लो,
जिसे अब तलक किसी की नज़र ने,
पलट कर भी नही देखा…

कहते हैं… इस दुनिया से जो चले जाते हैँ,
वो एक फ़रिश्ता बन जाते हैं…
की अब तो मैँ इंसान बनने के क़ाबिल भी नही.
अब मुझे मिटाने – ख़तम करने के खातिर ही सही
एक आख़िरी बार – लौट आओ ना …

10.01.2016

अधूरा किस्सा

एक अधूरा किस्सा, एक अधूरी रह गयी बात,
एक अधूरा ज़वाब और एक मुख़्तसर मुलाक़ात.
अनगिनत जागती रातें और वही मुकम्मल याद,
कितना कुछ बदल गया तेरे चुपचाप मुस्करा के चले जाने से…

उस पर से ये दीवाना दिल मेरा,
जिसे आज भी लगता है कि ज़वाब आएगा.
इस बार मुलाक़ात में इक़रार भी होगा,
वक़्त ऐसा किस्सा फिर से दोहराएगा.

बेफिजूल सा लगने लगता है सब,
जब याद पुरानी होती जाती है.
फिर वो मुस्कराता चेहरा सामने आता है,
और दिल को फिर से वही लत लग जाती है.

दिलो-दिमाग के ये रगड़े तो अब,
बरसो पुराने हो चले हैं…
मन कहता है इसकी इम्तेहां मुमकिन नही,
दिल कहता है इस बार अंदाज़ नया है.

ये किस्सा पूरा हो जाये, वो बात पूरी हो जाये,
बस एक बार तुम जो आ कर “हाँ” कह दो तो,
दिल का इंतज़ार खत्म हो, आँखों की प्यास मिट जाये,
भरोसे का मान रह जाये और रातों को नींद मिल जाये.

Grody Day

Don’t you remember??
Your last day with me in the town,
When I stood silent in the corner,
On knees, By leaning the head down.

Then you’re saying goodbye from the window,
And I’m running behind the train, Screaming,
Honey, Please don’t go… Please don’t go…

Why that Grody Day even came in my life??
That made me insane and took you long away,
Seems like it all just happened yesterday.

Those endless talking and late night meetings,
Watching stars in the sky and counting endure.
All promises and fun we made at the sea shore.

There after, The moments we lived together,
From the first meeting till that day before.
Remain unfaded & alive just to see you once more.

If I still exist for you, Either in memory or diary,
Please come and behear, Three golden words-Before I die.
That’s still remain untold & Probably we jointly can spy.

हमनाम

कभी घड़ी की टिक टिक,
कभी परिंदो का चहकना.
वक़्त बेवक़्त, गाड़ियों का शोर,
या बेमौसम बादलों का गरजना.

रुक रुक कर वो कंकर गिराते ट्रक,
तो कभी गली के कुत्ते का भोकना.
वो फेरी वाले की धुंधलाती आवाज़,
फिर अचानक से किसी जलसे का गुज़ारना …

तमाम अल्फाज़ो के परे.
सन्नाटे को चीरते हुए …
तेरे नाम जब मेरे कानो में पड़े,
मेरा जहाँ थम सा गया और
सब रस्मों – रिवाजो को भूल,
सच और वहम से बिना लड़े.
नज़र तुझे ढूंढने निकल पड़े …

पता तो था की वो तुम नही हो.
पर फिर भी …
एक कशिश सी थी उसे देखने की,
तुम ना सही …
तुम्हारे हमनाम को ही …

एक ख़्वाहिश ऐसी भी …

सुनसान से एक रस्ते पर,
जब चांदनी को बिखरे देखा।
अचानक नजरें ऊपर उठीं,
और मुझे, काले बादलों के बीच,
चाँद भी अकेला घूमता मिला।
(मेरी तरह)

यूँ तो बेशुध ख़ामोशी छायी थी,
पर हवाओं में कुछ तेज़ी आई थी।
पत्त्तों की सरसराहट मानो,
कोई पैग़ाम सुनाने आई थीं।

एक सिहरन उठी दिल थम सा गया,
मनो कोई बस – छू कर निकल गया।
क़दम ठहर गए – नज़रें पीछे मुड़ी,
पर हर बार की तरह इस बार भी,
महज़ सन्नाटे के – कोई ना मिला।

वैसे तो ये एकतरफा खेल,
अबतलक तुम ही जीतते आये हो.
आ जाओ न वापस बेसवाली बन कर,
जीतने का न सही हार का ही सही,
एक मुकम्मल दीदार का – मौका तो दो।

अब ये ग़रज़ कैसी और ये क्या, बरस क्यों पड़े?
चलो बंद करता हूँ ये आँखे और सवाल – जवाब भी।
आ नही सकते पर, छुपा तो सकते हो मुझे – खुद में,
इस बारिश में सराबोर अनवरत मेरे अश्कों की तरह ही …

29-06-2015